उत्तराखंड के सुलकियारा टनल में फंसे 41 मजदूरों के सुरक्षित बाहर निकलने के बाद उनके परिवारों ने राहत की सांस ली है.
ये मजदूर दिवाली के मौके पर एक हादसे के बाद फंसे हुए थे. अब जब वे 17 दिनों के बाद बाहर हैं, तो उनके कई घरों में दिवाली जैसा माहौल है।
अंदर फंसे 41 मजदूरों में से 15 झारखंड के, आठ उत्तर प्रदेश के, पांच-पांच बिहार और ओडिशा के, तीन पश्चिम बंगाल के, दो-दो असम और उत्तराखंड के और एक मजदूर हिमाचल प्रदेश का था।
सुरंग से निकाले जाने के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया है और वहां से जरूरी मेडिकल जांच के बाद उन्हें घर भेजा जा सकता है.
बाहर आए मज़दूर बता रहे हैं कि अंदर किस तरह के हालात थे, वे कैसा महसूस कर रहे थे और उन्हें क्या कठिनाइयां आईं.
झारखंड के सुबोध कुमार वर्मा ने बताया कि सुरंग का हिस्सा धंसने के बाद शुरुआत के 24 घंटे काफ़ी मुश्किल थे.
समाचार एजेंसी एएनआई के वीडियो में उन्होंने कहा, “हमें सिर्फ़ 24 घंटे दिक्क़त हुई. खाने और हवा (सांस लेने) को लेकर. फिर कंपनी ने खाने को लेकर काजू-किशमिश वगैरह भेजे और दस दिन के बाद हमेें दाल-रोटी और चावल खाने को मिला.”
उन्होंने कहा, “अब मैं स्वस्थ हूं, किसी तरह की कोई दिक्क़त नहीं है. मैं बिल्कुल सही हूँ. सब आप लोगों की दुआ और मेहनत है. केंद्र और राज्य सरकार की मेहनत से निकल आया हूँ, वरना अंदर क्या होता, मैं ही जानता हूँ.”
सुरक्षित निकले लोगों में झारखंड के विश्वजीत कुमार भी हैं. वह कंप्रेशर मशीन चलाते हैं. उन्होंने कहा कि उन्हें पूरा यक़ीन था कि उन्हें बचा लिया जाएगा और वह बाहर की दुनिया एक बार फिर देख सकेंगे.
उन्होंने एएनआई को बताया, “मैं बहुत ख़ुश और सुरक्षित हूँ. सभी श्रमिक ख़ुश हैं. अभी हम अस्पताल में हैं. मलबा सुरंग के मुहाने के पास गिरा. मैं उसके दूसरी ओर था. अंदर क़रीब ढाई किलोमीटर का हिस्सा ख़ाली था. हम वक़्त बिताने के लिए अंदर घूमा करते थे.”
विश्वजीत का भी यही कहना है कि फँसने के बाद के शुरुआती घंटे काफ़ी परेशानी हुई. उन्होंने बताया, “थोड़ा डर भी था शुरू में, लेकिन फिर जब खाना और पानी आया, उसके बाद परिजनों से बात हुई तो हमारा मनोबल लगातार बढ़ता गया. हमें जल्द ही यक़ीन हो गया कि हम बाहर की दुनिया देख पाएंगे.”
विश्वजीत कुमार वर्मा ने कहा, “जैसे ही ऊपर से मलबा गिरा, तब हमें लगा कि निकलने का रास्ता बंद हो गया. लेकिन सब लोग हमें निकालने के प्रयास में लगे रहे. फिर ऑक्सीजन और पानी के पाइप से खाने-पीने की व्यवस्था की गई. बाहर से मशीनें मंगाई गईं.”
उन्होंने बताया कि परिवार से बात होने से भी बड़ा सहारा मिला. उन्होंने कहा, “परिवार से बात हो रही थी. इसके लिए माइक लगाया गया था. उससे हम बात करते रहते.”
गब्बर सिंह नेगी के ‘नेतृत्व’ की सराहना
इस पूरे मामले में अब जो एक नाम चर्चा में आ रहा है, वह है गब्बर सिंह नेगी. वह इस प्रॉजेक्ट में टनल फ़ॉरमैन के तौर पर काम कर रहे थे.
जिस समय सुरंग का हिस्सा धंसा, उस समय वह भी 40 श्रमिकों के साथ अंदर फंस गए थे. बाहर निकले मज़दूरों ने बताया कि गब्बर सिंह नेगी लगातार उनका मनोबल बढ़ा रहे थे.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रेस्क्यू किए गए श्रमिकों से बात करते समय जब गब्बर सिंह नेगी से मुख़ातिब हुए, तो उन्होंने उनकी जमकर तारीफ़ की.
पीएम ने कहा, “आपको विशेष रूप से बधाई, आपने जिस तरह से लीडरशिप दिखाई है, उस पर आने वाले समय में किसी विश्वविद्यालय को शोध करना चाहिए कि कैसे गाँव के व्यक्ति ने मुश्किल हालात में नेतृत्व दिखाया और संकट के समय अपनी पूरी टीम को संभाला.”
वहीं गब्बर सिंह नेगी ने पीएम का शुक्रिया अदा किया और कहा कि उन्हें ख़ुशी है कि सबने उनका साथ दिया.
नेगी ने कहा, केंद्र सरकार, राज्य सरकार, एनडीआरएफ़, एसडीआरएफ़ और हमारी कंपनी ने हमारा हौसला बनाया, हमारा हालचाल लेते रहे. हम सब एक परिवार की तरह रहे. दोस्तों (अंदर फंसे) का भी शुक्रिया, जो मुश्किल घड़ी में शांत बने रहे, हमारी बात सुनी और हौसला नहीं छोड़ा.”

झारखंड के गांव में जश्न, छोड़े गए पटाखे
इस रेस्क्यू ऑपरेशन के सफल होने के बाद देश के कई हिस्सों से आम लोगों द्वारा ख़ुशी मनाने की तस्वीरें और वीडियो सामने आए.
प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से संबंध रखने वाले मज़दूरों के परिजनों की भी राहत और ख़ुशी भरी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं.
41 में से सबसे ज़्यादा 15 मज़दूर झारखंड से थे. रांची के ओरामांझी के खीराबेड़ा गांव में 17 दिनों बाद ख़ुशियां लौटी हैं.
इस गांव के तीन लड़कों- राजेन्द्र बेदिया, अनिल बेदिया और सुखराम बेदिया के उत्तरकाशी टनल से सुरक्षित निकलने की ख़बर से गांव वालों ने राहत की सांस ली है. अब लोगों को उनके गांव लौटने का इंतज़ार है.
बीबीसी सहयोगी रवि प्रकाश ने बताया कि गांववालों को मंगलवार रात आठ बजे मज़दूरों के सुरंग से सुरक्षित निकलने की ख़बर मिली. इसके बाद गांववालों ने पटाखे छोड़े. सुबह भी पटाखे छोड़े गए और एक-दूसरे का मुंह मीठा करवाकर ख़ुशियां मनाई गईं.
तीनों लड़कों के परिजनों ने उनके सुरक्षित घर वापसी के लिए मन्नतें मांगी हुई थीं. अनिल बेदिया की मौसी घटना के बाद से ही उनके घर पर आई हुई हैं. ख़ुशख़बरी मिलते ही उन्होंने घर के बाहर पूरे द्वार की लीपाई की. घर में पूजा-पाठ की भी तैयारी चल रही है.
इन तीनों ने जिस स्कूल में पढ़कर मैट्रिक पास की है, वहां भी जश्न का माहौल है. स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों और शिक्षकों ने ढोल मांदर की थाप पर नाचकर जश्न मनाया.

